History

नैमिषारण्य तीर्थ विश्व का सबसे प्राचीन तीर्थ है क्योंकि सतयुग के प्रारम्भ में जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने मनु और सतरूपा नामक प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री को मैथुनी सृष्टि के लिये प्रकट किया तब इन दोनांे ने पृथ्वी लोक पर दीर्घ समय तक एक क्षत्र राज्य किया और प्रकृति द्वारा प्रदत्त अनेको ऐश्वर्यो का भोग कर अपना राज्य अपने पुत्र को खुशी - खुशी देकर आत्म संतुष्टि के लिये चल पड़े। सम्पूर्ण विश्व की वन्दनीय, दिव्य ऋषि मुनियांे से सेवित नैमिषारण्य नामक तपोभूमि में आकर तपस्या की।

बरबस राज सुतहिं तब दीन्हा, नारि समंेत गवन बन कीन्हा।।1Ž4रा.च.मा.बा.काण्ड1Ž2

23 हजार वर्ष तक तप करने के कारण इनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश कई बार इनके पास आये और वरदान मांगने को कहा

बिधि हरि हर तप देख अपारा, मनु समीप आये बहु बारा।।1Ž4रा.च.मा.बा.काण्ड1Ž2

1Ž431Ž2 तत्पश्चात् भगवान नारायण के रूप से प्रभावित होकर मनु जी ने उन्हें ही पुत्र रूप में पाने का वरदान माँग लिया फलस्वरूप त्रेता युग में मनु रूपी राजा दशरथ के घर नारायण रूपी पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म हुआ फिर त्रेतायुग में भगवान राम द्वारा इस पवित्र भुमि में आकर ऋषि मुनियों का सत्कार किया और यहाँ उन्हांेने अश्वेध यज्ञ का आयोजन किया। द्वापर में महर्षि व्यास जी के द्वारा इसी भूमि पर अपने पाँच शिष्यों को आध्यात्मिक ज्ञान के श्रोत स्वरूप वेद शास्त्र और पुराणों को उपदेश किया।

महर्षि व्यास जी के शिष्यों में श्रेष्ठ रोमहर्षण नामक ऋषि हुये जिनको हम सब सूत जी के नाम से जानते हैं, इन्होंने शौनकादि अठ्ठासी हजार ऋषियों को संसार के मूढ़ मनुष्यों में भगवत भक्ति को जागृत कराने के लिये भगवत् लीला स्वरूप समस्त 18 पुराणों का वाचन किया जिससे समस्त ऋषिगण पूरे विश्व में इनका प्रचार प्रसार कर जन साधारण के हृदय में भगवत भक्ति को प्रवाहित कर सके।

इसी काल में पाण्डव अज्ञातवास करते हुये नैमिषारण्य में ऋषि मुनियों के सानिध्य को प्राप्त किये।

यहाँ त्रेता में अहिरावण का वध कर पाताल लोक से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुये हनुमान जी का दिव्य स्थल है, जहाँ हनुमान जी की 21 हाथ की विशाल प्रतिमा खड़ी हुई जिन्होंने राम और लक्षमण को अपने कन्धों पर बिठा रखा है।

इस पवित्र भूमि में 51 सिद्धपीठों में से एक माँ ललिता देवी का अत्याधिक प्राचीन मंदिर है जहाँ माँ ललिता देवी ने ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश त्रिदेव के मानस चक्र को अपनी हाथ की हथेली पर धारण कर रखा है जो ब्रह्ममनोमय चक्र के नाम से नैमिषारण्य तीर्थ का केन्द्र बना हुआ है।

हम समस्त भक्तों को ज्ञात है कि महर्षि वेदव्यास जी ने ही वेद का विस्तार कर 4 वेदों, छः शास्त्रों एवं 18 पुराणों की रचना की जिनको इन्होंने जैमिनी, अंगिरा, पैलव, वैशम्पायन एवं रोमहर्षण नामक शिष्यों को ज्ञान कराया। इन पाँच शिष्यों में रोमहर्षण ऋषि व्यास जी के विशेष कृपापात्र थे, इसलिये इनको इन्होंने समस्त 18 पुराणों का ज्ञान प्रवचन किया।

रोमहर्षण जी के द्वारा ही भगवत कथा रसिक शौनकादि 88 हजार ऋषियों ने समस्त पुराणों को 1Ž4सहस्त्र1Ž2 ज्ञान सत्र के रूप मे श्रवण किया। महर्षि रोमहर्षण जी को ऋषियों ने अपना सूत यानि मार्ग दर्शक स्वीकार किया और बाद मंे इन्हीं को सूत जी महाराज कहा गया, अल्पज्ञानी लोग सूत जी को सूत जाति से सम्बन्धित कर देते हैं, परन्तु हमंे ये बोध होना चाहिये सनातन धर्म मे कभी भी किसी व्यक्ति का जाति बोधक नाम नही होता उदाहरणतः न कभी किसी का नाम ब्राह्मण न क्षत्रिय, वैश्य और न शुद्र ही रखा गया है, जबकि दक्षिण भारत के विद्वान पं0 बाल कृष्ण द्वारा अनुवादित वायुपुराण में अग्नि कुण्डम् समद्भूतं सूतो विमलमानसः। से प्रमाणित होता है कि सूत जी का जन्म अग्निकुण्ड से ऋषियों द्वारा यज्ञ के दौरान हुआ, जिनके दर्शन से ऋषियों के रोंगटे खड़े हो गये क्योंकि इनके ललाट पर इतना तेज था अथैव इनका प्रथम नाम रोमहर्षण हुआ । महर्षि श्री सूत जी साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे तभी तो शौनकादि ऋषियों ने इन्हें

अज्ञानध्वान्तविध्वंसकोटिसूर्यसमप्रभ। सूताख्याहि कथासारं मम कर्ण रसायनम् ।।1Ž4श्रीमद् भागवत मा0 चतुर्थ श्लोक1Ž2

श्री सत्य नारायण वृत कथा जिसको कि विशेष कर कलियुग के पापी, खली, अधमी मनुष्यों के कल्याण के लिये तीर्थ नैमिषारण्य मंे सहस्त्रांे वर्षों तक चलने वाले ज्ञान सत्र मे महर्षि श्री सूत जी ने शौनकादि ऋषियों को स्कन्द पुराण के रेवाखण्ड से श्रवण कराया ।

ये वृत पूजा सर्व प्रथम देवर्षि नारद जी ने भगवान श्री हरि नारायण के श्री मुख से श्रवण की तत्पश्चात पूर्व काल यानि इस कल्प के पहले के युगों मंे जिन लोगांे ने की उनकी कथा प्रेरणा रूप में श्री सूत जी ने ऋषियों को श्रवण करायी । 1 श्री सत्य नारायण वृत कथा जिसका तात्पर्य नारायण के एक ऐसे स्वरूप का पूजन अर्चन कर वृत रखना जिससे मनुष्य की लौकिक पारलौकिक आकांक्षाओं को सत्य के साथ पूर्ण करने में सहायक हो, जिस प्रकार से मोमबत्ती का प्रकाश हमंे दिन में या सायं काल में कम सहायक होकर रात में अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है उसी प्रकार से सत्य की आराधना सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग की अपेक्षा कलियुग में अधिक प्रभावी होती है, क्योंकि कलियुग मे झूठ आडम्बर बेईमानी लोभ रूपी अंधकार अधिक है, जिसके कारण सत्य नारायण वृत पूजन की महिमा अपने आप इस युग में अधिक हो जाती है इस पूजन विधि को कालान्तर मे पहली बार महर्षि श्री सूत जी ने नैमिषारण्य तीर्थ मे शौनकादि ऋषियों को श्रवण करायी प्रमाण -

एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः । पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ।। श्री सत्य नारायण वृत कथा प्रथम श्लोक।